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गुरू गोरक्षनाथजी के जन्म के सम्बन्ध में चर्चा

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दुर्गापूजा मोहर्रम समारोहों की व्यस्तता समाप्त होने से पहले ही हमारे सांसद श्री राहुल गांधी जी का तीन दिवसीय अमेठी दौरा आ गया था और अब दो दिन बाद हमारे माननीय मुख्यमंत्री जी का जनपद अमेठी आने का कार्यक्रम नियत हो गया है इसलिये व्यस्तता का आकलन आप स्वयं कर सकते हैं।  इस बीच यह किंवदंती भी सुनी है कि माननीय मुख्यमंत्री जी जिस गोरक्षनाथपीठ के पीठेश्वर हैं उन आदि श्री गोरक्षनाथजी का जन्म स्थान यहीं कहीं जायस कस्बे में स्थित है। समयानुसार उस स्थल की भी पडताल करूंगा आज उन आदि गुरू गोरक्षनाथजी के जन्म के सम्बन्ध में चर्चा करना चाहता हूं।   गोरक्षनाथ के जन्मकाल पर विद्वानों में मतभेद हैं। राहुल सांकृत्यायन इनका जन्मकाल 845 ई. से 1300ई. के मध्य का मानते हैं। नाथ परम्परा की शुरुआत बहुत प्राचीन रही है, किंतु गोरखनाथ से इस परम्परा को सुव्यवस्थित विस्तार मिला। गोरखनाथ के गुरु मत्स्येन्द्रनाथ थे। दोनों को चौरासी सिद्धों में प्रमुख माना जाता है। गुरु गोरखनाथ के जन्म के विषय में जन मानस में एक किंम्बदन्ती प्रचलित है , जो कहती है कि गोरखनाथ ने सामान्य मानव के समान किसी म...

भूस्वामित्व अभिलेखों पर अकबर और टोडरमल की उपस्थिति

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''काल गणना’’ काल गणना से संबंधित किसी पोस्ट में मैने बताया था कि सन् 20817 ई0 ऐसा समय होगा जब क्रिश्चियन और इस्लाम का अंतर समाप्त हो जायगा यानी क्रिश्चियन ग्रेगेरियन कलेन्डर और हिजरी कलेन्डर में ऐक जैसा वर्ष सन् 20817 हि0/ई0होगा।  अब बात करतें हैं ऐक और ऐसे कलेन्डर की जिसमें और हिजरी वर्ष में कोई अन्तर न था। वह वर्ष था सन् 1556 ई0 का जब अकबर का राज्यारोहण हुआ था। इस वर्ष की हिजरी संवत 963 हि0 थी। अकबर के नवरत्नों में से एक टोडरमल थे जिन्होने अकबर के समय में समूचे साम्राज्य की भूमि का बन्दोबस्त कराया था। टोडरमल ने राज्य की समूची भूमि को उसकी श्रेणी और स्वामित्व के आधार पर वर्गीक्रत करते हुये इसका अभिलेखीकरण कराया था। भूअभिलेखोें को खतौनी का विशिष्ट नाम भी इसी काल में मिला। भूअभिलेखों का मुख्य सरोकार खेती अथवा फसल से होता था इसलिये इसके सामयिक विभाजन को फसल की उत्पादकता से जोडा गया और इस सामयिक विभाजन को ऐक खास नाम दिया गया फसली वर्ष और अकबर के राज्यारोहण के हिजरी वर्ष संवत 963 हि0 की संख्या 963 को यथावत फसली वर्ष 963 के रूप में अंकित किया गया।  ग्रेगेरियन कलेन्डर के अनुरू...

तब क्रिश्चियन और इस्लामी कलेन्डर ऐक से होगें...!

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'' काल गणना'' आज जब सम्पूर्ण विश्व में सामान्यतः ऐक ग्रेगेरियन कलेन्डर ही लागू है तब भी अलग अलग धर्मो के तीज त्यौहार मनाने के लिये वे अपने कलेन्डर को ही मान्यता प्रदान करते है। इस हिसाब से हिन्दू त्यौहार शक संवत् अथवा विक्रमी संवत से इस्लामी त्यौहार हिजरी संवत से तथा फसल से जुडे त्यौहार फसली संवत से मनाये जाते हैं। सामान्यतः सभी कलेन्डरों में सूर्य की गति के आधार पर एक  वर्ष 365-366 दिनो का ही होता है। हिन्दू वर्ष चन्द्रगति पर निर्भर करता है परन्तु इसे सूर्य की गति से जोडने के लिये इसमें अधिमास की मान्यता है जिसके अनुसार प्रत्येक वर्ष बारी बारी से ऐक माह को अधिमास के रूप् में मनाया जाता है। ऐसे मे विभिन्न संवतो के पारस्परिक संबंध को याद रखने के लिये साधारण सा फार्मूला यह है कि- *सामान्य ई0 सन् से शक् संवत निकालने के लिये लिये 78 वर्ष धटाना है । यथा 2017 का शक् संवत 1939 है *सामान्य ई0 सन् से विक्रमी संवत निकालने के लिये 57 वर्ष जोडना है। यथा 2017 का विक्रमी संवत 2074 है *इस बार सामान्य ई0 सन् से हिजरी संवत निकालने के लिये 579 घटाना है। यथा 2017 का हिजरी संवत 1438...