फिर कहता हूं ...!

कल ही 
माँ ने हिदायत दी थी
उम्र बढ़ रही है तुम्हारी 
अब सुबह सुबह भजन सुना करो 
आज वही कर रहा हूँ माँ..?
मखमल का कवर लगी 
एक कुर्सी पर बैठा 
तन्मय होकर, डूबकर
एक भजन सुन रहा हूँ
''....जाऊ कहाँ तजि चरण तुम्हारे...''
आँखे बंद है 
लेकिन जानती हो माँ..!
यादे मिटती ही नहीं उसकी 
पता नहीं 
उसे याद भी है कि नहीं-
उस दिन कैसे 
बेधडक बेखौफ निश्चिंत 
चली आयी थी वेा
उस अंजुमन में 
आते ही
गुलाबी मखमल कवर लगी कुर्सी पर 
धम्म से बैठ गयी थी
बहुत देर बैठी रही
लोग आते गये 
वेा मिलती रही
हां मै भी तो मिला था उससे
औपचारिक अभिवादन के साथ
बैठ गया था 
पास ही खाली पडी कुर्सी पर
कुछ देर बाद 
उठकर चली गयी थी वेा
और मैने लपक ली थी 
उसकी वाली कुर्सी
और बंद कर ली थी आंखे
क्योंकि उस मखमल के कवर में 
बाकी थी उसकी उष्मा
जिसे गंवाना नहीं चाहता था 
जैसे कोई बच्चा 
नही गंवाना चाहता वो उष्मा 
जो उसे मां के गर्भ में मिलती है
तभी तो 
बाहर आते ही 
रोने लगता है नवजात 
मुझे माफ करना मां...!
याद नही है वह जीवनदायनी उष्मा 
लेकिन 
उस मखमली उष्मा को 
आज भी 
पुनः अनुभव कर लेता हूं 
जब भी कभी
किसी मखमली कुर्सी पर बैठता हूं 
आंखे बंद कर लेता हूं 
फिर कहता हूं 
औरों को चढता होगा नशा
मुझे तो तुम चढी हो प्रिये ...!

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

गजेटियर की कहानी ..

#गउमाता_की_जै

शिक्षक दिवस पर गुरु घंटाल को भी नमन