अंग्रजी शासकों ने शासन को सुगम बनाने के लिये प्रत्येक जनपद के बारे सभी प्रकार की जानकारियां जुटाकर उसे गजेटियर के रूप में संकलित करने की अवधारणा को आरंभ किया था। सर्वप्रथम एक अंग्रेज सिविल सेवक (आइ0सी0एस0) विलियम विल्सन हन्टर ने 1861 में भारत में ब्रिटिश शासन के भौगोलिक कोश को तैयार किये जाने की रूप रेखा तैयार की।(अरे!.. वही 'हन्टर शिक्षा आयोग' वाले हन्टर जी..) श्री विलियम 1862 में बंगाल में नियुक्त हुये और वहीं से उन्होंने अपनी इस महत्वपूर्ण योजना पर कार्य आरंभ करते हुये आंकडे जुटाने आरंभ कर दिये। पहली बार सभी संकलित सूचनायें 1881 में 'द इम्पीरियल गजेटियर आफ़ इण्डिया' के नाम से प्रकाशित हो सकी। अग्रेतर वर्षो में इसी प्रकार की सूचनाओं का संग्रहण ब्रिटिश शासन के अधीन भारत के सभी जनपदों के लिये किया गया और उन्हें प्रकाशित करते हुये डिस्ट्रिक्ट गजेटियर का नाम दिया गया।
बचपन से जिन संस्कारों में पले उनमें घर में बनी पहली रोटी गउमाता के लिये निकालना एक आदत के रूप में शामिल रहा है। जब हमारी दादी जीवित थीं तो उनकी गोसेवा की चर्चा गांव घर की सामाऐं लांघ कर दूर दूर तक फैली रहती थीं। पिछली किसी पोस्ट में इससे जुडा ऐक किस्सा सुनाया भी था जब गाय का एक उदण्ड बछडा उनकी गोदी में चढने की जिद करता हुआ इस तरह आगे बढा कि दादीजी का पांव फ्रैक्चर हो गया था। इसके बावजूद दादी जी की गोसेवा अबाध गति से जारी रही थी । दादी जी तो नहीं रही लेकिन उनके किस्से और उनकी दी हुयी सीख आज भी हमारे परिवार की परंपरा हैं। इस परंपरा का निर्वहन जैसे अब हमारे घर की सबसे बुजुर्ग सदस्य माता जी कन्धों पर आ गयी है। रात के भोजन में बनी पहली रोटी सुबह उठकर सबसे पहले गाय को खिलाने के बाद ही उनकी दिनचर्या प्रारंभ होती है। दो दिन पहले होली वाले दिन भी वो अपने इसी उपक्रम को पूरा करने के लिये वो उठीं और गाय को रोटी खिलाने के लिये घर से बाहर निकलीं तो सामने से दौडकर आ रही गाय को देखकर उत्साहित हो गयीं। दौडकर आती गौमाता के पास आने पर उन्हें भान हुआ कि वह गाय तो बदहवास भा...
जीवन यात्रा से बड़ा कोई शिक्षक नहीं है। सो आज का विशिष्ट नमन जीवन यात्रा के उन अनुभवों को जो कड़वे होने के कारण सबसे अच्छे शिक्षक सिद्ध हुए। जीवन यात्रा के प्रारम्भिक चरणों का ऐसा अनुभव जो याद आ रहा है वो कक्षा सात के आसपास का है। स्थान वही पौड़ी का डी ऐ वी कालेज.... सहपाठियों में कई नाम अच्छे थे लेकिन एक नाम था सलिल.....जी हाँ ..! शायद सलिल ही नाम था उसका...! मैं नया नया प्रभावित हुआ था उसके लंबे बालों को देखकर..! कॉपी पर लिखते हुए उसके बाल आँखों पर आ जाते तो वह बड़ी स्टाइल से सिर को झटक कर उन्हें वापिस अपने सिर पर ले आता । उसे न होम वर्क की चिन्ता रहती और न ही कापियों के कवर फटने की..! वो कक्षा में पीछे की सीट पर बैठता था और मैं अगली पंक्ति में।सलिल जी से मुलाक़ात जा संयोग कुछ इस वजह से बना कि विद्यालय में किन्ही बड़े अफसर का निरीक्षण होना था सो अगली पंक्ति में बैठने वालो को पीछे की पंक्तियों में अलग अलग स्थान पर समायोजित किया गया था ताकि निरीक्षणकर्ता को पिछली पंक्तियों में भी होमवर्क पूरा करने वाले अच्छे छात्रो का आभास मिल सके। उस निरीक्षण का क़िस्सा फिर कभी सुनाऊंगा लेकिन आज सलिल के साथ...
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